Wednesday, May 13, 2020

क्यूँ.... क्यूंकि इक उम्मीद है | 

मैं एक प्रतिबिम्ब हूँ ,
तुम्हारे जीवन का प्रतिबिम्ब | 
जब तुम मंच पर खड़े होकर पुरस्कार ले रहे होते हो, 
जब तुम उसकी पार्टी में अपने संघर्ष के किस्से सुना रहे होते हो ,
जब तुम अपने नवीन सोच पे गर्व कर रहे होते हो ,
तो तुम्हारे पीछे खड़ा, मैं मुस्करा रहा होता हूँ; 
तुम्हारी सफलता में एक भविष्य देख रहा होता हूँ | 
वो किस्से मैं सुनता हूँ, समझने की कोशिश करता हूँ | 
अपनी अगली पीढ़ी को सुनाता हूँ, समझाता हूँ | 

क्यूँ.... क्यूंकि इक उम्मीद है | 

इक उम्मीद है, उसे खोना नहीं चाहता | 
उम्मीद कि शायद हमारी रेखाएं भविष्य में कहीं मिल जाएँ , 
उम्मीद कि शायद मेरा वर्तमान  बदल जाए | 
मैं चलता  हूँ, दौड़ता हूँ , गिरता हूँ , उठता हूँ और फिर चलता  हूँ | 

क्यूँ.... क्यूंकि इक उम्मीद है | 

ऐसा नहीं, कि 
मैं वास्तविकताओं को नहीं समझता | 
ऐसा नहीं कि हक़ीक़त से मेरा पाला नहीं पड़ता |
हर दिन मेरी समस्याएं  मेरी आँखों में झांकती है,
हर दिन हताशा आती है, 
हर दिन मैं हारता हूँ ,
और हर दिन,  तुम्हारे उन्हीं किस्सों के सहारे उठने का प्रयास करता हूँ  | 

क्यूँ.... क्यूंकि इक उम्मीद है | 

अनुभवों से कुछ मैंने सीखा है, समझा है 
सीखा है उम्मीद करना, पुरजोर मेहनत करना 
सीखा है, हर अपमान को भूल जाना 
सीखा है, गिरना उठना और फिर चलना 
नहीं सीखा तो अपेक्षाएं करना,
नहीं सीखा तो बातों को दिल से लगाना,
नहीं सीखा तो हार जाना,
नहीं सीखा तो चोटों को भुलाना |  

क्यूँ.... क्यूंकि इक उम्मीद है | 

उम्मीद है, भविष्य की 
उम्मीद है, वर्तमान से बहार निकलने की 
उम्मीद है, अपने किस्से बनाने की 
उम्मीद है, किसी की प्रेरणा बनने  की 
उम्मीद है, आप सबके द्वारा खुद को इंसान समझने की |  
उम्मीद है , मेरे अधिकारों के पहचान की, 
उम्मीद है, मेरे व्यक्तित्व के पहचान की | 
क्यूँ.... क्यूंकि मुझे अपने आपसे इक उम्मीद है | 
क्यूँ.... क्यूंकि मुझे  इंसानियत पे उम्मीद है |  

Sunday, May 15, 2016

क्यूँ चुभी ये बात?

कल कुछ बात हुई,
बात साधारण ही थी,
साधारण बातचीत का ही क्रम था
और उस क्रम में मैंने कुछ कह दिया
उसमे ना तो कोई नसीहत थी, और ना ही ज्ञानवान बनने की इच्छा
बस एक तर्क था, स्थितियों का एक विश्लेषण था
कहा इसलिए कि वो बात सही लगी, महत्वपूर्ण लगी
मेरे खुद के लिए नहीं,
सपनों के लिए, भविष्य के लिए ।

लेकिन तब बात चुभ क्यूँ गयी?
क्यूँ चुभी ये बात?
बात तो सीधी सी ही थी, निश्छल भावनाएं शब्दों के रूप में थी
और क्रम भी बड़ा सहज ही था ।
तो गलती किसकी,
बात की, परिस्थितियों की, भावनाओं की
या दो भिन्न वयक्तिवों की
या फिर दो वयक्तिवों के अहम की?

सोचने वाली बात है,
कुछ दिनों पहले ही मुझसे कहा गया था,
किसे चुनो,  कैसे चुनो
क्या करो, क्या ना करो
तब तो बात ऐसे ही निकल गयी थी,
ना तो चुभन थी, ना ही टीस
बस एक समझ दिखी थी ।

Wednesday, April 20, 2016

चंद पंक्तियाँ !

खुद को जानना ही काफी होता तो क्या होता,
दूसरों को समझना ही काफी होता तो क्या होता,
बस यूँ ही बोलना ही काफी होता तो क्या होता मगर,
सही वक़्त पे बातों को अगर समझा देते, तो क्या वो काफी होता?
                ------

इक अहसास था जिसे समझ ना पाया,
समझा भी तो शायद समझा न पाया
सुना है-वास्तविकताओं और तर्क से चलती है ज़िन्दगी
तो फिर इस अहसास को क्युं दबा न पाया?
                ------

थोड़ा समय देते तो मैं समझ ही जाता,
इन बातों को भुला भी पाता ,
हर जवाब इतना सीधा नहीं होता
कई बार वक्त ही हमें समझा है पाता ।
                ------

मंजिलें तो मिल ही जाएंगी,
जरूरी है.... घर से निकलना ।
हर फासला क्यों तुम ही तय करो,
जरूरी है...दो कदम तुम चलो , दो कदम हमारा चलना।
                ------

कभी तू भी तो दो कदम चल
कभी तू भी तो हाथ बढ़ा,
कभी तू भी तो कुछ कह,
ऐसा क्या अहम है तेरा,
कभी तू भी तो लग कि तू भी एक इंसान है |
                ------

हर कदम मैं ही क्यूँ चलूँ ,
तुम भी तो कुछ कहो,
जब सफर साथ का है तो,
बाधाएं तुम भी तो हल करो ।
                ------

पिंजरे से दूर भागना तो तेरी फितरत है, 
लेकिन इतना भी उन्मुक्त न हो जा, कि खुला आसमान भी पिंजरा लगने लगे।

Saturday, March 12, 2016

सच्चा मानव !

बचपन की सीखें 
पढ़ी हुई चंद पंक्तियाँ, आप भुला नहीं पाते हो
ऐसा ही कुछ था,
मैंने पढ़ा था - मानव का जीवन विनिमय की ऐसी तुला है जिसमे कोई पासंग नहीं है !
लगता है.. मैंने ज्यादा ही गंभीरता से ले लिया 
जिंदगी भर इसे संतुलित करने का प्रयास करता रहा 
सोचा कम से कम सच्चा मानव तो बन पाउँगा! 
शायद यहीं गलती हो गयी, असली मानव तो वो है,
जो तुला को किसी एक तरफ झुका सके,
कुछ ना कुछ किसी ना किसी को बेच सके, अक्सरहां वास्तविकता से ज्यादा 
और सबसे ख़ास बात तो ये है-यहाँ सब बिक  सकता है,
इंसान कर्म भावनाएं सपनें धर्म संस्कृति और आध्यात्म भी ! 

Saturday, November 29, 2014

सपनों के सौदागर....

मुझे आगे बढ़ना है,
केवल गेहूं ही नहीं, गुलाब की महक भी महसूस करनी है ।
मुझे केवल वर्तमान में ही नहीं, भविष्य में भी जीना है ;
या वर्तमान ही को भविष्य जैसा बनाना है ।
हाँ..... ये एक सपना तो है,
थोड़ा कठिन भी है इसे पूरा करना ;
लेकिन सपने कठिन तो होते ही हैं ।
और फिर, कई सौदागर भी तो हैं
जो सपने बेचने और खरीदने के काम में पारंगत है ;
नहीं हुआ तो उन्हीं में से किसी से खरीद लूंगा ।

अभी तो कल ही एक मिला था, उसने तो भाईचारे की बात की;
बोलता था, ये खरीद-फरोख्त छोडो , भविष्य को आपस में बाँट लेंगे;
बस तुम मेरा बांया हाथ पकड़ लो,
और हाँ ध्यान से पकड़ना, बायां ही होना चाहिए ।
उसकी ये बात सुनकर एक और सौदागर की बात याद आ गयी,
उसने दूकान पे बुलाया था,
बोला था की दूकान पे आना पड़ेगा, थोड़ी बहुत मोल-तोल भी कर लेंगे..
बस ये दायें हाथ के बीच वाली उंगली की  सीध में आ जाना ।
कल भी किसी से मिलने जाना है ,
सुना है वो कुछ दूसरे सामान के फायदों से सपने सस्ते में बेचता है ,
सोच रहा हूँ इसको भी देख ही लूँ ।
और फिर उन किताब वालों को भी तो देखना है,
कई सारे हैं, शायद उन्हीं से कोई अच्छा सौदा मिल जाए ।

सौदागर तो कई हैं,
बेचने को तैयार भी हैं,
दाम भी सही लग रहा  है;
बस कोई गारंटी देने को तैयार नहीं है.…
सब यही कहते हैं.... जैसे इसे रखोगे ये वैसा ही चलेगा ।

Friday, August 22, 2014

तुम्हें कोई शक है ?

इस बार मोदी जीतेगा, तुम्हें कोई शक है
मैं तो वही कहता हूँ जो सत्य है ।
केजरीवाल देश बदल के रख देगा, तुम्हें कोई शक है
मैं तो वही कहता हूँ जो सत्य है ।
राहुल गांधी बहुत बड़े बेवकूफ हैं, तुम्हें कोई शक है
मैं तो वही कहता हूँ जो सत्य है ।
मैं धर्म निरपेक्ष बाकि सब सांप्रदायिक हैं, तुम्हें कोई शक है
मैं तो वही कहता हूँ जो सत्य है ।
मैं ईमानदार बाकि सब भ्रष्ट हैं , तुम्हें कोई शक है
मैं तो वही कहता हूँ जो सत्य है ।
मैं विकास पुरुष, स्थिरता का वाहक हूँ , तुम्हें कोई शक है
मैं तो वही कहता हूँ जो सत्य है ।
मैं पूंजीवादी बाकी सब समाजवादी हैं, तुम्हें कोई शक है
मैं तो वही कहता हूँ जो सत्य है ।
मैं नहीं आया तो देश टूट जाएगा, तुम्हें कोई शक है
मैं तो वही कहता हूँ जो सत्य है ।
वो आ गया तो खून की नदियां बहेंगी, तुम्हें कोई शक है
मैं तो वही कहता हूँ जो सत्य है ।

तभी किसी ने बोला.... बहुत बड़े बुद्धिजीवी लगते हो,
मैंने बोला, तुम्हें कोई शक है??
क्यूंकि यही सत्य है...यही सत्य है!

Saturday, March 30, 2013

आवाजें....

जैसे ही अपने कमरे से बाहर निकलता हूँ ,
माध्यम चाहे जो भी हो,
हर तरफ से बस आवाजें ही आवाजें, हर तरह की आवाजें |

किसी के रोने की  तो किसी के हंसने की ,
किसी के चिल्लाने की तो किसी को कोसने की ,
किसी के गुस्से की तो किसी के पछताने की ,
किसी के झुंझलाहट की तो किसी के सांत्वना की 
अनगिनत.....आवाजें ही आवाजें , हर तरह की आवाजें।

सामूहिक रूप में ये एक शोर सी लगती हैं,
ना तो इनके मायने दीखते हैं, ना ही कोई उद्देश्य
मन करता है ,
इनसे दूर... इस शोर से दूर.... बस निश्चिन्तता  और शान्ति |

किन्तु,
ये शान्ति भी चुभती है, ये निश्चिन्तता भी खटकती है ,
क्या वो शोर ही था ?क्या वो आवाजें बेमानी थी ?
कहीं मैं समझने में भूल तो नहीं कर रहा ?
या  मैं समझकर भी अनजाना बनना चाहता हूँ ?
फिर से बाहर निकलता हूँ ...
इस बार थोडा परखने की कोशिश करता हूँ 
कुछ समझता भी हूँ ..कुछ अर्थ भी निकलते हैं
फिर भी अंत में सामूहिक रूप से....सब शोर ही लगता है, सब बेमानी ही लगता है  |
फिर मन करता है....
इनसे दूर... इस शोर से दूर.... बस निश्चिन्तता  और शान्ति |

मन में उलझन बरकरार है, मैं समझ नहीं पा रहा ....
वो शोर है या उन आवाजों के कुछ मायने हैं ?
वो एक समूह के निरर्थक शब्द हैं या इसके घटकों के जीवन के प्रतिबिम्ब ?

Tuesday, April 3, 2012

तुम क्या ही लिखोगे !!!

सोचा कि कुछ लिखूं,
इन बीतें पलों को कुछ शब्दों में बयाँ करूँ,
इन नए अनुभवों को शब्दों का एक रूप दे दूं ,
इन गलियों, इन चौराहों...को कुछ शब्द समर्पित कर दूं | 

तभी कहीं भीतर से एक आवाज़ आती है,
यहाँ तो एक ज़िन्दगी सी बीत गयी, 
और तुम कुछ पलों की बात करते हो |
यहाँ तुम्हारी शख्सियत ही बदल गयी, 
और तुम अनुभवों को शब्दों में बयाँ करने की बात करते हो |

ये गलियाँ, ये चौराहे...
जहाँ एक अलग सी ज़िन्दगी ही पनपती है, 
जहाँ हर रोज नए विचार जन्म लेते हैं,
जहाँ हर रोज एक नवीनता का आभास होता है,
जहाँ ना तो कोई बंधन है  ना ही विचारों के प्रवाह को थामने वाली पुरानी मान्यताएं,
और तुम इन्हें कुछ शब्द समर्पित करने की बात करते हो | 

तुम क्या ही कहोगे, तुम क्या ही लिखोगे 
तुम्हारे हर शब्द, तुम्हारे हर विचार, तुम्हारी हर सोच
इस जीवन का ही एक प्रतिबिम्ब है |
ये जीवन , ये पल , ये अनुभव तुम्हारे व्यक्तित्व के मूल में हैं ,
तुम्हारा यह अस्तित्व...इन्हीं पलों, इन्हीं विचारों की एक  देन है |
तुम तो बस उन पुरातन पदचिन्हों का अनुसरण कर सकते हो,
इस अवसर हेतु ऋणी हो सकते हो , बस ऋणी हो सकते हो | 

Wednesday, January 25, 2012

मिश्राजी की चिट्ठियां - हमारा राष्ट्रीय अवकाश गणतंत्र दिवस


प्यारे पाठकों,
सबसे पहले आप सभी को मिश्राजी का प्रणाम !

आज 26 जनवरी है तो सोचा आपको एक चिट्ठी लिखी जाए | वैसे तो 26 जनवरी  को हिंदी में गणतंत्र दिवस भी कहते हैं किन्तु अगर मैं इन शब्दों का प्रयोग करूँ तो कुछ पाठकों को शायद समझने में कष्ट होगा और फिर वह चिट्ठी ही क्या जो पढने वाले तक अपनी बात ना पहुंचा पाए |  वैसे तो आजकल अपना गणतंत्र केवल शब्दों के खेल में ही फंसा हुआ है फिर भी मैं निवेदन करूँगा की  आप शब्दों को छोढ़कर भावनाओं पर ध्यान केन्द्रित करें | 
वैसे आप भी सोच रहे होंगे इस ईमेल, फेसबुक और SMS के ज़माने में मिश्राजी को चिट्ठी लिखने की क्या सूझी ? हालाँकि इसका कोई स्पष्ट कारण तो मेरे पास नहीं है फिर भी मुझे लगा की अगर बात पुराने तरीके से कही जाए तो हो सकता है लोगों को ज्यादा समझ में आये | वैसे भी आजकल जब टाइम्स ऑफ़ इंडिया की बातें गंभीरता से लेने लायक नहीं हैं तो फेसबुक की क्या मजाल और ईमेल का तो क्या ही कहना...आधे से ज्यादा ईमेल तो हम पढ़ते भी नहीं हैं | खैर चलिए, जब हमने चिट्ठी लिख दी है तो उम्मीद करूँगा आप पढ़ भी लेंगे | वैसे चिट्ठी लिखने का एक कारण यह भी है की पता नहीं हमारे गणतंत्र में फेसबुक की हालत चीन जैसी कब हो जाए और मेरी बात को किसी संप्रदाय, समूह या फिर व्यक्ति विशेष के विरूद्ध साजिश का हिस्सा बता दिया जाए |  
वैसे आज सुबह के समाचार पत्रों में आपने देशभक्ति की कई सारे बातें पढ़ी होंगी...चाहे जो हो जाए, आज के दिन हर समाचार पत्र को देश और इसके कर्णधारों की जरूर याद आती है और मुख्य पृष्ठ पर वास्तविक प्रेम की जगह देशप्रेम दिखाई देता है... परन्तु सच कहूं तो ये सब बेमानी है | आज के दौर में देशप्रेम की जरूरत ही क्या है ? वैसे भी कहते हैं ना... 'हमारे पूर्वज मर गए हमें आज़ादी दिलाने में और हम मरे जा रहे हैं प्रेमिका की बाहों में आज़ादी लुटाने में ' | वैसे भी समय नहीं गंवाना चाहिए..इस प्रेम में एक-एक दिन कीमती होता है तो ऐसे में अगर हमने एक दिन गँवा दिया तो हो सकता है कल हम अपने आपको अपनी प्रेमिका के लिए रोता पाएं | और देश का क्या है.... वो कल भी था, आज भी है और कल भी यहीं रहेगा |  एक बात जो मुझे और ज्यादा कचौटती है कि कुछ लोग अचानक से आज के दिन समाचार पत्र और टीवी चैनलों पर प्रकट हो जाते हैं | देश का लोखा-जोखा प्रस्तुत करने लगते हैं...कुछ देश कि दुर्दशा पर रोने लगते हैं | अब बताइए...भला यह भी कोई बात हुई..साल भर गायब रहते हैं और एक दिन रोने पहुँच जाते हैं | इन्हें मालूम ही नहीं कि देश इतनी तरक्की कर रहा है...हर व्यक्ति को रोजगार, हर भूखे को भोजन, हर बच्चे को शिक्षा के क़ानून लागूं हैं हमारे गणतंत्र में...और भई इतना बड़ा देश है, इतनी विभिन्नताएं...दो-चार सौ साल तो लगेंगे ही इन समस्याओं को दूर होने में | यह भी एक संभावना है कि दो-चार सौ साल तक यह गणतंत्र ना रहे तब भी समस्याएं तो ख़त्म हो जाएँगी ना...जब गणतंत्र ही नहीं हैं तो कैसी समस्याएं | और तो और आज के दिन एका बड़ा ही विचित्र अनुभव होता है...मैं समझ नहीं पाता...कुछ लोगों को अचानक से जोश आ जाएगा और मुझे आमंत्रित कर लेंगे किसी ना किसी चर्चा में | और चर्चा का विषय भी बड़ा अजीब सा होता है...मुझे तो समझ में ही नहीं आता |  अब आप ही बताइए... कैटरिना कैफ और सलमान खान के अफेयर की चर्चा हो तो मजा भी आये...ये बाल विवाह, खाप पंचायत, भ्रष्टाचार, चुनाव सुधार, मानवाधिकार जैसे शब्द किसी को समझ में भी आते हैं | आज एक दिन बड़ी मुश्किल से छुट्टी मिलती है और मुझे जैसे प्रतिभावान युवा का भी समय ऐसे बेकार कि चर्चाओं से बर्बाद कर देते हैं | कुछ लोग तो और भी हैं...अचानक से 'दर्दे-डिस्को' की जगह 'ऐ मेरे वतन के लोगों ' को बजाने लगते हैं...भई मुझे इस कर्ण भेदन से छुटकारा चाहिए | 

मैंने कईयों को अपना कष्ट समझाने की कोशिश की है किन्तु कोई समझने को तैयार ही नहीं हैं | हार मानकर मैंने सोचा चिट्ठी ही लिखी जाए | जब साल भर हम तकिया तानकर सोते हैं तो आज राष्ट्रीय अवकाश के दिन ये सब बातें करके क्यूँ नींद ख़राब की जाए | आज तो हमें और भी मजे से सोना चाहिए...बल्कि मैं तो कहता हूँ अगर काम के भागम भाग में कोई फिल्म छुट गयी हो तो उसे भी निपटा लीजिये | और देखिये ये जो कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी चिल्ला रहे हैं..इनकी बातों में ना पड़ जाइएगा..आपकी छुट्ठी बर्बाद हो जायेगी | अरे देश कहीं भागे नहीं जा रहा है....मजे से चले जा रहा है बल्कि मैं तो कहूँगा रेंग रहा है....अगर हम कहीं पीछे छुट भी गए तो दौड़ के पकड़ लेंगे....अपना ही तो देश है .. | आइये हम और आप मिलकर इस राष्ट्रीय अवकाश का सदुपयोग किया जाए और गणतंत्र दिवस का असली आनंद उठाया जाए |

सभी को राष्ट्रीय अवकाश की ढेरों शुभकामनाएं ! 

आपका,
मिश्राजी !


Friday, August 19, 2011

तू है तो.....

तू है तो इक आशा है,
तू है तो उम्मीद की एक किरण दिखती है
तू है तो विश्वास है कि कल फिर आएगा
तू है तो मेरी भविष्य की उम्मीदें जीती हैं |

तू है तो मुझे इक मंजिल दिखती है,
तू है तो ये कुछ कर गुजरने ज़ज्बा होता है,
तू है तो मेरे ये सपने जन्म लेते हैं,
तू है तो ये सफलता की चाहत पनपती है |

तू है तो ये भावनाएं जन्म लेती हैं
तू है तो मेरी कल्पना उड़ान भरती है ,
तू है तो इन शब्दों की प्रेरणा मिलती है,
तू है तो इन शब्दों से एक कविता निकलती है |

Tuesday, July 26, 2011

ऐ-हुक्म के आकाओं.....

ऐ-हुक्म के आकाओं, मेरी इक बात तुम सुन लो ;
इक आग उठने वाली है, हो सके तो बच लो |

ये सिर-फिरी मनमानियां, चल ना पाएंगी इस क़दर ;
हमारे सब्र को न तोड़ो, तुम अब गिरोगे जमीन पर |

इन आँधियों ने कितनों के, मिटा दिए हैं नामों-निशां,
अभी भी वक़्त है सम्हल लो, न तबाह करो ये गुलिस्तां |

इक नसीहत है तुम्हें, इतिहास के पन्नों को पलट लो ;
इन्कलाब की आवाज़ गूंज रही, इन इशारों को समझ लो |


Sunday, July 17, 2011

मैं चाहता हूँ...

हवा की स्वच्छन्द्ता चाहता हूँ,
लहरों की चंचलता चाहता हूँ, 
इस असीम आकाश की गंभीरता चाहता हूँ,
क्षितिज जैसा विस्तार चाहता हूँ |
पेड़ पर लिपटी बेल का उत्साह चाहता हूँ,
सागर की गहराई चाहता हूँ, 
चांदनी की शीतलता चाहता हूँ,
और इस दुनिया में बस इंसानियत की पहचान चाहता हूँ |  

Thursday, May 26, 2011

प्यार में ज़िन्दगी बिताइए....

इधर से जो गुजर गयी, उसी पे हम मचल गए,
जो कुछ न हो सका तो फिर करीब से निकल गए |
कुछ पल का दुःख फिर मस्त हो हम चल लिए,
नए चेहरों की तलाश में फिर हम बढ़ लिए | 

सभी हसीन सभी जवान किसी पे दिल को हारिए,
जब किसी पे दिल आ जाये तो उसके लिए फाईट मारिये |
दिले-ज़ज्बात इज़हार करने में कभी ना हिचकिचाईये,
इन्कार का डर निकाल कर प्रेम पथ पर बढ़ते जाइए |

अगर सफल ना हुए तो तनिक भी ना घबराईये,
दिल को सम्हालिए, और फिर से खोज में लग जाईये |
दुनिया में हसीनों की कमी नहीं, दिल को ये समझाइये,
रोने धोने में में क्या रखा है, प्यार में ज़िन्दगी बिताइए |

यह कविता मेरे और मेरे प्रिय मित्र शैलेष अग्रवाल के सम्मिलित प्रयास का परिणाम है |  

Sunday, May 22, 2011

कुछ पंक्तियाँ...

नींद आती ही है किसको !
जैसे ही मैं अपने कमरे कि तरफ बढ़ा तो किसी ने कहा "शुभरात्रि!!"
अब इसका जवाब मैं क्या ही दूं, यहाँ नींद आती ही है किसको, यहाँ तो सब आराम करते हैं | 
आराम करते हैं ताकि ये शरीर जवाब ना दे जाए, ये अंग काम करते रहे|
चैन से सोये तो ना जाने कितना समय हो गया, अब तो वो सुनहरे अतीत की यादें लगती हैं | 
अब तो सुबह कि ताज़ी किरणे भी इस सतत जीवन प्रवाह में एक मोड़ की तरह लगती हैं,
अब तो सपने में भी ज़िन्दगी दौड़ती रहती है, हम दौड़ते रहते हैं  |




पंक्तियाँ!
आज चिर-परिचित पन्नों में कुछ पंक्तियों को ढूंढने की कोशिश कर रहा था,
पता नहीं वो पंक्तियाँ कहाँ खो सी गयी हैं ?
अक्षर तो जाने पहचाने से लगते हैं, लेकिन वो पंक्तियाँ नहीं मिल रही....
या उन्हें मैं पहचान नहीं पा रहा...
कहीं ऐसा तो नहीं इस बदलते परिदृश्य में...उन पंक्तियों के मायने बदल गए हैं..
या शायद परिस्थितियां बदल गयी हैं ..और उन पुरानी पंक्तियों में मैं नए अर्थ ढूँढने की कोशिश कर रहा हूँ...
कहीं ऐसा तो नहीं इस परिवर्तनशील समाज में, मेरा इन पंक्तियों को ढूंढना ही अब प्रासंगिक ना रहा..

जो भी हो, उन किताबों के पन्ने पलटने का यह क्रम जारी है ...
उन पंक्तियों की, उन मायनों की तलाश जारी है...




क्यूँ डरते हो इन परेशानियों से?
क्यूँ डरते हो इन परेशानियों से,
क्यूँ डरते हो इन रास्तों से ?
क्यूँ डरते हो आने वाली चुनौतियों से?
क्यूँ घबराते हो कल के अनजानेपन से ?

अगर ये परेशानियां नहीं होती, तो क्या यही तुम्हारी मंजिल होती ?
और अगर ये रास्ते ना होते तो, तुम्हें कौन अपनी मंजिल तक पहुंचाता?
ये चुनौतियां ही तो हैं जो तुम्हारे लक्ष्य के महत्व को बताती है,  
और ये कल का अनजानापन ही तो है जिसमे एक आशा है, एक अप्रत्याशित ख़ुशी है |




भूत-भविष्य और वर्तमान....
कोई भूत काल की यादों में जीना चाहता है, तो किसी के लिए भविष्य की आशाएं ही जीने का सहारा हैं|  कई हैं जो वर्तमान कि वास्तविकताओं को ही ज़िन्दगी समझते  हैं | उनके लिए ये भूत-भविष्य की बातें बेमानी हैं |
लेकिन मुझ जैसे भी हैं...जो जीते हैं, भूत की सुनहरी यादों के बीच वर्तमान की वास्तविकताओं का सामना करते हुए, भविष्य की  अनगिनत आशाओं साथ!






Saturday, April 23, 2011

दुःख नहीं कि हमें मन चाहे दृश्य ना मिले...


आज सोचता हूँ तो,
मझधार में फंसी कश्ती की तरह,
कभी किनारा ना मिला
हाथ में फंसे रेत की तरह,
सहारा ना मिला |

समय को पकड़ने की,
 ना जाने, कितनी ही कोशिशें कर डाली |
स्तिथियों को बदलने की,
ना जाने, कितनी ही मिन्नतें कर डाली |

फिर भी,
दुःख नहीं कि, हर कदम गलत ही दिखे,
दुःख इस बात का है कि,
हमने देखने कि कोशिशें कर डालीं| 
दुःख नहीं कि, हमें मन चाहे दृश्य ना मिले ,
दुःख इस बात का है कि,
जो भी मिले, हमने उनकी बेईज्ज़ती कर डाली | 

Tuesday, January 25, 2011

गणतंत्र दिवस की पूर्वसंध्या पर......



मैं निराश नहीं हूँ, मैं हताश नहीं हूँ | 

मैं मानता हूँ कि..... गलतियां हुईं हैं,
मैं मानता हूँ कि..... सब कुछ अच्छा नहीं है;
मैं मानता हूँ..... सुधार की आवश्यकता है |

किन्तु हमारे विखंडन का जो सपना देखते हैं,
मैं उनसे यह कहना चाहता हूँ...
ये उनकी एक कल्पना है....
केवल कोरी  कल्पना है,
जिसका यथार्थ से कोई सम्बन्ध नहीं है;
जिसका यथार्थ में कोई आधार नहीं है |


इस गणतंत्र दिवस की पूर्वसंध्या पर आप सबसे कहना चाहता हूँ......

विकास की प्रक्रिया में जो असफलताएं हमें मिली हैं ;
उसे स्थायी ना समझो, उसे ही अपना भाग्य ना समझो |
याद रखो तुम किस संस्कृति के वाहक हो;
याद रखो तुम किस परंपरा के निर्वाहक हो |
याद रखो उन त्यागों को, याद रखो अमर बलिदानों को |

तो आओ, ये निराशा और किन्किर्त्व्यमुड़ता का आवरण उखाड़ फेंकते हैं...
जनमानस में आशा का प्रवाह करते हैं, निर्माण का प्रयत्न करते हैं, 
देश के निर्माण में...हम अपना योगदान करते हैं |

जय हिंद!!!!!!!

Saturday, November 27, 2010

ऐ नियति....

ऐ नियति , 
तुने कितने सपने दिखाए थे,
मन में ना जाने कितने ही अरमान जगाये थे |
तेरे सहारे,
एक स्वर्णिम भविष्य की कल्पना की थी,
चिलचिलाती धूप में छाँव की तमन्ना की थी |
तेरे भरोसे,
सपनों की एक दुनिया बनायी थी,
इच्छाओं आशाओं की इक पुटली सजायी थी |
सोचा था, 
अपने इस वीरान जीवन को सतरंगी कर दूंगा,
इन दुःख और निराशा के बादलों को भेद दूंगा |  

पर ना, 
तुझसे  मेरी ख़ुशी देखी ना गयी,
एक सामान्य मनुष्य की महत्वाकांक्षा सही ना गयी |
मेरे हर पथ में तुने कांटे बोंये, 
हर चीज छिनी जो मुझे प्यारी थी,
तुने मेरे हर सपने तोड़े, 
मेरी जरा सी ख़ुशी भी तुझे ना गँवारी थी? 

पर तुने क्या सोचा,
इन सबसे मैं पराजित हो जाऊंगा, निराश हो जाऊँगा ?
हताश होकर क्या अपनी महत्वाकांक्षाओं को भूल जाऊंगा ?

तो मैं बस तुझसे कहना चाहता हूँ , 
तुने अभी मेरा चरित्र समझा ही नहीं है,
मेरी इच्छाओं की गहारियों को नापा ही नहीं है |
तुने मेरी चाल जरूर धीमी कर दी है ,
पर मैं हताश नहीं हूँ, निराश नहीं हूँ,
मैंने अपनी महत्वाकांक्षाओं को छोड़ा नहीं है,
अपनी इच्छाओं को त्यागा नहीं है | 
तुझे जीतनी चालें चलनी है, तू चल दे;
तुझे जीतने कंकड़ बिछाने हैं, बिछा दे ;
पर याद रख, 
तेरे बनाये इन तमाम झंझावातों को मैं पार कर लूँगा,
देर से ही सही, हर सफलता मैं प्राप्त कर लूँगा |
तू मुझे मेरे पथ से विचलित ना कर पाएगी, 
लाख कोशिशें कर ले, मुझे परास्त नहीं कर पाएगी |


Monday, November 22, 2010

आइये इस ज़िन्दगी नामक किताब का नया संस्करण निकाला जाए....

अपनी ज़िन्दगी से हमें कई शिकायतें हैं.....

कहीं ना कहीं हम सब अपनी ज़िन्दगी से उब चुके हैं ,
इन तमाम परेशानियों से खिंच चुके हैं |
हम सबके जीवन में 
कई तरह की चिंताएं है ,
तमाम असफलताएं हैं , 
दबी-कुचली  इच्छाएं हैं . 
ना जाने कितनी ही....आधी-अधूरी  आशाएं हैं |

इन सब के चक्कर में ,
हमने जीवन को भागमभाग का एक खेल बना रखा है
ज़िन्दगी की किताब के अधिकांश पन्नों को ,
दुःख और परेशानियों से भर रखा है | 
इन पन्नों में खुशियों का कहीं नामों निशाँ नहीं दीखता;
इनमें हर पल एक मातम सा हो रखा है |

और हम बस, इन्हीं पन्नो को पलटते जा रहे हैं,
इससे ही ज़िन्दगी परिभाषित करते जा रहे हैं | 


मैं तो कहता हूँ ,
ज़िन्दगी की ये किताब अब पुरानी हो गयी है |
आइये इस ज़िन्दगी नामक किताब का नया संस्करण निकाला जाए ;
नए पन्ने जोड़े जाएँ, नए अध्याय जोड़े जाएँ |

आइये, इसमें जोड़ते हैं उन पन्नो को, उन छोटे-छोटे तमाम पलों को, 
जिन्हें हम इस भाग दौड़ में भुला देते |
आइये जोड़ते हैं उन तमाम छोटी छोटी खुशियों को,
जिनके मायने आज बदल गए हैं | 
आइये दुबारा खोजते हैं उन रिश्तों को,
जिन्हें हम आगे बढ़ने के चक्कर में भूल चुके हैं |
आइये जोड़ते हैं उन आदर्शों को,
जो आज किताबी बातें बनकर रह गए हैं |  
आइये जोड़ते हैं उन अहसासों को, उन अनुभूतियों को 
जो हमें इंसान बनती हैं |

आइये जीने रहने का मूल उद्देश्य बदल देते  हैं ,
जो की जिंदादिली से जीना है, दूसरों के लिए कुछ करके जाना है,
ना की हर पल अपने स्वार्थ में भागते रहना | 

Monday, September 6, 2010

मैं बताता हूँ....मोहब्बत कितनी हसीन होती है ??

लोग मोहब्बत में खुदा देख लेते हैं ,
जीने मरने की कसमें बाँध लेते हैं,
हर पल हसीन हो जाता है 
किसी की नींद तो किसी का चैन खो जाता है |
कुछ के लिए ये जीवन का हसीन पल होता है ,
तो किसी के लिए शायराना खयाल होता है, 
किसी को जन्नत की सीढियां दिख जाती हैं,
तो किसी को ख़ुशी का आशियाँ मिल जाता है | 

मैंने भी यही उम्मीद की थी,
इश्क करने की एक भूल की थी |
इस मोहब्बत में, 
ना जाने कितने हसीन ख्वाबों को हकीकत का रूप देना था,
ना जाने कितने हसीन पलों को संजोना था |
न जाने कितनी कसमें हमने खायीं थी,
ना जाने कितने वादे हमें निभाने थे | 

लेकिन ना जाने.....
कहाँ गयी वो कसमें , कहाँ गए वो वादे ;
सब एक झटके में टूट गया,
मोहब्बत का आशियाँ एक पल में बिखर गया |
सारी कसमें झूठी सी हो गयीं ,
सारी यादें धुंधली सी हो गयीं |
सारे वादे-सारे बंधन सब टूट गए,
और हम अपने आंसुओं के साथ अकेले ही रह गए | 

मैं कहता हूँ....
उन कमबख्त शायरों को बुलाओ,
उन कमबख्त आशिकों को बुलाओ, 
मैं बताता हूँ....मोहब्बत कितनी हसीन होती है ?
उन हसीन पलों का क्या होता है,
उन ख्वाबों का क्या होता है ?
मैं बताता हूँ, एक पल में ये सब कैसे बिखर जाता है?
कैसे आदमी तन्हाँ हो जाता है ?

कैसे आदमी तन्हाँ हो जाता है ?

Thursday, September 2, 2010

इसी मोहब्बत की आग में हम जल मिटे.....

हमारी मोहब्बत को आप समझ न सके, 
हमारी मोहब्बत में आप तड़प न सके ,
हमारे ज़ज्बातों को आप दरकिनार कर, 
बड़ी बेदर्दी से हँसते ही रहे...... (2) | 

इसे आपकी मासूमियत कहूं, या आपकी बेरुखी, ...... (2) 
इसे अपना दीवानापन कहूं  या सच्ची दिल्लगी;
जो भी कहूं, सच तो ये है ..... (2)
बेवफाई का ये कड़वा घूँट हमें पीना ही पड़ा..... (2)
न चाह कर भी आपकी गलियों से मुहं मोड़ना ही पड़ा | 

दुःख तो यह है.......... (2)
कितनी कोशिशों, कितनी मिन्नतों के बाद भी,
दिल में आपके मोहब्बत की आग हम लगा न सके |
खुदा कसम..... लेकिन , 
इसी मोहब्बत की आग में हम जल मिटे,
इसी मोहब्बत की आग में हम जल मिटे |