अपनी ज़िन्दगी से हमें कई शिकायतें हैं.....
कहीं ना कहीं हम सब अपनी ज़िन्दगी से उब चुके हैं ,
इन तमाम परेशानियों से खिंच चुके हैं |
हम सबके जीवन में
कई तरह की चिंताएं है ,
तमाम असफलताएं हैं ,
दबी-कुचली इच्छाएं हैं .
ना जाने कितनी ही....आधी-अधूरी आशाएं हैं |
इन सब के चक्कर में ,
हमने जीवन को भागमभाग का एक खेल बना रखा है
ज़िन्दगी की किताब के अधिकांश पन्नों को ,
दुःख और परेशानियों से भर रखा है |
इन पन्नों में खुशियों का कहीं नामों निशाँ नहीं दीखता;
इनमें हर पल एक मातम सा हो रखा है |
और हम बस, इन्हीं पन्नो को पलटते जा रहे हैं,
इससे ही ज़िन्दगी परिभाषित करते जा रहे हैं |
मैं तो कहता हूँ ,
ज़िन्दगी की ये किताब अब पुरानी हो गयी है |
आइये इस ज़िन्दगी नामक किताब का नया संस्करण निकाला जाए ;
नए पन्ने जोड़े जाएँ, नए अध्याय जोड़े जाएँ |
आइये, इसमें जोड़ते हैं उन पन्नो को, उन छोटे-छोटे तमाम पलों को,
जिन्हें हम इस भाग दौड़ में भुला देते |
आइये जोड़ते हैं उन तमाम छोटी छोटी खुशियों को,
जिनके मायने आज बदल गए हैं |
आइये दुबारा खोजते हैं उन रिश्तों को,
जिन्हें हम आगे बढ़ने के चक्कर में भूल चुके हैं |
आइये जोड़ते हैं उन आदर्शों को,
जो आज किताबी बातें बनकर रह गए हैं |
आइये जोड़ते हैं उन अहसासों को, उन अनुभूतियों को
जो हमें इंसान बनती हैं |
आइये जीने रहने का मूल उद्देश्य बदल देते हैं ,
जो की जिंदादिली से जीना है, दूसरों के लिए कुछ करके जाना है,
ना की हर पल अपने स्वार्थ में भागते रहना |