Sunday, July 17, 2011

मैं चाहता हूँ...

हवा की स्वच्छन्द्ता चाहता हूँ,
लहरों की चंचलता चाहता हूँ, 
इस असीम आकाश की गंभीरता चाहता हूँ,
क्षितिज जैसा विस्तार चाहता हूँ |
पेड़ पर लिपटी बेल का उत्साह चाहता हूँ,
सागर की गहराई चाहता हूँ, 
चांदनी की शीतलता चाहता हूँ,
और इस दुनिया में बस इंसानियत की पहचान चाहता हूँ |  

Thursday, May 26, 2011

प्यार में ज़िन्दगी बिताइए....

इधर से जो गुजर गयी, उसी पे हम मचल गए,
जो कुछ न हो सका तो फिर करीब से निकल गए |
कुछ पल का दुःख फिर मस्त हो हम चल लिए,
नए चेहरों की तलाश में फिर हम बढ़ लिए | 

सभी हसीन सभी जवान किसी पे दिल को हारिए,
जब किसी पे दिल आ जाये तो उसके लिए फाईट मारिये |
दिले-ज़ज्बात इज़हार करने में कभी ना हिचकिचाईये,
इन्कार का डर निकाल कर प्रेम पथ पर बढ़ते जाइए |

अगर सफल ना हुए तो तनिक भी ना घबराईये,
दिल को सम्हालिए, और फिर से खोज में लग जाईये |
दुनिया में हसीनों की कमी नहीं, दिल को ये समझाइये,
रोने धोने में में क्या रखा है, प्यार में ज़िन्दगी बिताइए |

यह कविता मेरे और मेरे प्रिय मित्र शैलेष अग्रवाल के सम्मिलित प्रयास का परिणाम है |  

Sunday, May 22, 2011

कुछ पंक्तियाँ...

नींद आती ही है किसको !
जैसे ही मैं अपने कमरे कि तरफ बढ़ा तो किसी ने कहा "शुभरात्रि!!"
अब इसका जवाब मैं क्या ही दूं, यहाँ नींद आती ही है किसको, यहाँ तो सब आराम करते हैं | 
आराम करते हैं ताकि ये शरीर जवाब ना दे जाए, ये अंग काम करते रहे|
चैन से सोये तो ना जाने कितना समय हो गया, अब तो वो सुनहरे अतीत की यादें लगती हैं | 
अब तो सुबह कि ताज़ी किरणे भी इस सतत जीवन प्रवाह में एक मोड़ की तरह लगती हैं,
अब तो सपने में भी ज़िन्दगी दौड़ती रहती है, हम दौड़ते रहते हैं  |




पंक्तियाँ!
आज चिर-परिचित पन्नों में कुछ पंक्तियों को ढूंढने की कोशिश कर रहा था,
पता नहीं वो पंक्तियाँ कहाँ खो सी गयी हैं ?
अक्षर तो जाने पहचाने से लगते हैं, लेकिन वो पंक्तियाँ नहीं मिल रही....
या उन्हें मैं पहचान नहीं पा रहा...
कहीं ऐसा तो नहीं इस बदलते परिदृश्य में...उन पंक्तियों के मायने बदल गए हैं..
या शायद परिस्थितियां बदल गयी हैं ..और उन पुरानी पंक्तियों में मैं नए अर्थ ढूँढने की कोशिश कर रहा हूँ...
कहीं ऐसा तो नहीं इस परिवर्तनशील समाज में, मेरा इन पंक्तियों को ढूंढना ही अब प्रासंगिक ना रहा..

जो भी हो, उन किताबों के पन्ने पलटने का यह क्रम जारी है ...
उन पंक्तियों की, उन मायनों की तलाश जारी है...




क्यूँ डरते हो इन परेशानियों से?
क्यूँ डरते हो इन परेशानियों से,
क्यूँ डरते हो इन रास्तों से ?
क्यूँ डरते हो आने वाली चुनौतियों से?
क्यूँ घबराते हो कल के अनजानेपन से ?

अगर ये परेशानियां नहीं होती, तो क्या यही तुम्हारी मंजिल होती ?
और अगर ये रास्ते ना होते तो, तुम्हें कौन अपनी मंजिल तक पहुंचाता?
ये चुनौतियां ही तो हैं जो तुम्हारे लक्ष्य के महत्व को बताती है,  
और ये कल का अनजानापन ही तो है जिसमे एक आशा है, एक अप्रत्याशित ख़ुशी है |




भूत-भविष्य और वर्तमान....
कोई भूत काल की यादों में जीना चाहता है, तो किसी के लिए भविष्य की आशाएं ही जीने का सहारा हैं|  कई हैं जो वर्तमान कि वास्तविकताओं को ही ज़िन्दगी समझते  हैं | उनके लिए ये भूत-भविष्य की बातें बेमानी हैं |
लेकिन मुझ जैसे भी हैं...जो जीते हैं, भूत की सुनहरी यादों के बीच वर्तमान की वास्तविकताओं का सामना करते हुए, भविष्य की  अनगिनत आशाओं साथ!






Saturday, April 23, 2011

दुःख नहीं कि हमें मन चाहे दृश्य ना मिले...


आज सोचता हूँ तो,
मझधार में फंसी कश्ती की तरह,
कभी किनारा ना मिला
हाथ में फंसे रेत की तरह,
सहारा ना मिला |

समय को पकड़ने की,
 ना जाने, कितनी ही कोशिशें कर डाली |
स्तिथियों को बदलने की,
ना जाने, कितनी ही मिन्नतें कर डाली |

फिर भी,
दुःख नहीं कि, हर कदम गलत ही दिखे,
दुःख इस बात का है कि,
हमने देखने कि कोशिशें कर डालीं| 
दुःख नहीं कि, हमें मन चाहे दृश्य ना मिले ,
दुःख इस बात का है कि,
जो भी मिले, हमने उनकी बेईज्ज़ती कर डाली | 

Tuesday, January 25, 2011

गणतंत्र दिवस की पूर्वसंध्या पर......



मैं निराश नहीं हूँ, मैं हताश नहीं हूँ | 

मैं मानता हूँ कि..... गलतियां हुईं हैं,
मैं मानता हूँ कि..... सब कुछ अच्छा नहीं है;
मैं मानता हूँ..... सुधार की आवश्यकता है |

किन्तु हमारे विखंडन का जो सपना देखते हैं,
मैं उनसे यह कहना चाहता हूँ...
ये उनकी एक कल्पना है....
केवल कोरी  कल्पना है,
जिसका यथार्थ से कोई सम्बन्ध नहीं है;
जिसका यथार्थ में कोई आधार नहीं है |


इस गणतंत्र दिवस की पूर्वसंध्या पर आप सबसे कहना चाहता हूँ......

विकास की प्रक्रिया में जो असफलताएं हमें मिली हैं ;
उसे स्थायी ना समझो, उसे ही अपना भाग्य ना समझो |
याद रखो तुम किस संस्कृति के वाहक हो;
याद रखो तुम किस परंपरा के निर्वाहक हो |
याद रखो उन त्यागों को, याद रखो अमर बलिदानों को |

तो आओ, ये निराशा और किन्किर्त्व्यमुड़ता का आवरण उखाड़ फेंकते हैं...
जनमानस में आशा का प्रवाह करते हैं, निर्माण का प्रयत्न करते हैं, 
देश के निर्माण में...हम अपना योगदान करते हैं |

जय हिंद!!!!!!!

Saturday, November 27, 2010

ऐ नियति....

ऐ नियति , 
तुने कितने सपने दिखाए थे,
मन में ना जाने कितने ही अरमान जगाये थे |
तेरे सहारे,
एक स्वर्णिम भविष्य की कल्पना की थी,
चिलचिलाती धूप में छाँव की तमन्ना की थी |
तेरे भरोसे,
सपनों की एक दुनिया बनायी थी,
इच्छाओं आशाओं की इक पुटली सजायी थी |
सोचा था, 
अपने इस वीरान जीवन को सतरंगी कर दूंगा,
इन दुःख और निराशा के बादलों को भेद दूंगा |  

पर ना, 
तुझसे  मेरी ख़ुशी देखी ना गयी,
एक सामान्य मनुष्य की महत्वाकांक्षा सही ना गयी |
मेरे हर पथ में तुने कांटे बोंये, 
हर चीज छिनी जो मुझे प्यारी थी,
तुने मेरे हर सपने तोड़े, 
मेरी जरा सी ख़ुशी भी तुझे ना गँवारी थी? 

पर तुने क्या सोचा,
इन सबसे मैं पराजित हो जाऊंगा, निराश हो जाऊँगा ?
हताश होकर क्या अपनी महत्वाकांक्षाओं को भूल जाऊंगा ?

तो मैं बस तुझसे कहना चाहता हूँ , 
तुने अभी मेरा चरित्र समझा ही नहीं है,
मेरी इच्छाओं की गहारियों को नापा ही नहीं है |
तुने मेरी चाल जरूर धीमी कर दी है ,
पर मैं हताश नहीं हूँ, निराश नहीं हूँ,
मैंने अपनी महत्वाकांक्षाओं को छोड़ा नहीं है,
अपनी इच्छाओं को त्यागा नहीं है | 
तुझे जीतनी चालें चलनी है, तू चल दे;
तुझे जीतने कंकड़ बिछाने हैं, बिछा दे ;
पर याद रख, 
तेरे बनाये इन तमाम झंझावातों को मैं पार कर लूँगा,
देर से ही सही, हर सफलता मैं प्राप्त कर लूँगा |
तू मुझे मेरे पथ से विचलित ना कर पाएगी, 
लाख कोशिशें कर ले, मुझे परास्त नहीं कर पाएगी |


Monday, November 22, 2010

आइये इस ज़िन्दगी नामक किताब का नया संस्करण निकाला जाए....

अपनी ज़िन्दगी से हमें कई शिकायतें हैं.....

कहीं ना कहीं हम सब अपनी ज़िन्दगी से उब चुके हैं ,
इन तमाम परेशानियों से खिंच चुके हैं |
हम सबके जीवन में 
कई तरह की चिंताएं है ,
तमाम असफलताएं हैं , 
दबी-कुचली  इच्छाएं हैं . 
ना जाने कितनी ही....आधी-अधूरी  आशाएं हैं |

इन सब के चक्कर में ,
हमने जीवन को भागमभाग का एक खेल बना रखा है
ज़िन्दगी की किताब के अधिकांश पन्नों को ,
दुःख और परेशानियों से भर रखा है | 
इन पन्नों में खुशियों का कहीं नामों निशाँ नहीं दीखता;
इनमें हर पल एक मातम सा हो रखा है |

और हम बस, इन्हीं पन्नो को पलटते जा रहे हैं,
इससे ही ज़िन्दगी परिभाषित करते जा रहे हैं | 


मैं तो कहता हूँ ,
ज़िन्दगी की ये किताब अब पुरानी हो गयी है |
आइये इस ज़िन्दगी नामक किताब का नया संस्करण निकाला जाए ;
नए पन्ने जोड़े जाएँ, नए अध्याय जोड़े जाएँ |

आइये, इसमें जोड़ते हैं उन पन्नो को, उन छोटे-छोटे तमाम पलों को, 
जिन्हें हम इस भाग दौड़ में भुला देते |
आइये जोड़ते हैं उन तमाम छोटी छोटी खुशियों को,
जिनके मायने आज बदल गए हैं | 
आइये दुबारा खोजते हैं उन रिश्तों को,
जिन्हें हम आगे बढ़ने के चक्कर में भूल चुके हैं |
आइये जोड़ते हैं उन आदर्शों को,
जो आज किताबी बातें बनकर रह गए हैं |  
आइये जोड़ते हैं उन अहसासों को, उन अनुभूतियों को 
जो हमें इंसान बनती हैं |

आइये जीने रहने का मूल उद्देश्य बदल देते  हैं ,
जो की जिंदादिली से जीना है, दूसरों के लिए कुछ करके जाना है,
ना की हर पल अपने स्वार्थ में भागते रहना |