Saturday, November 29, 2014

सपनों के सौदागर....

मुझे आगे बढ़ना है,
केवल गेहूं ही नहीं, गुलाब की महक भी महसूस करनी है ।
मुझे केवल वर्तमान में ही नहीं, भविष्य में भी जीना है ;
या वर्तमान ही को भविष्य जैसा बनाना है ।
हाँ..... ये एक सपना तो है,
थोड़ा कठिन भी है इसे पूरा करना ;
लेकिन सपने कठिन तो होते ही हैं ।
और फिर, कई सौदागर भी तो हैं
जो सपने बेचने और खरीदने के काम में पारंगत है ;
नहीं हुआ तो उन्हीं में से किसी से खरीद लूंगा ।

अभी तो कल ही एक मिला था, उसने तो भाईचारे की बात की;
बोलता था, ये खरीद-फरोख्त छोडो , भविष्य को आपस में बाँट लेंगे;
बस तुम मेरा बांया हाथ पकड़ लो,
और हाँ ध्यान से पकड़ना, बायां ही होना चाहिए ।
उसकी ये बात सुनकर एक और सौदागर की बात याद आ गयी,
उसने दूकान पे बुलाया था,
बोला था की दूकान पे आना पड़ेगा, थोड़ी बहुत मोल-तोल भी कर लेंगे..
बस ये दायें हाथ के बीच वाली उंगली की  सीध में आ जाना ।
कल भी किसी से मिलने जाना है ,
सुना है वो कुछ दूसरे सामान के फायदों से सपने सस्ते में बेचता है ,
सोच रहा हूँ इसको भी देख ही लूँ ।
और फिर उन किताब वालों को भी तो देखना है,
कई सारे हैं, शायद उन्हीं से कोई अच्छा सौदा मिल जाए ।

सौदागर तो कई हैं,
बेचने को तैयार भी हैं,
दाम भी सही लग रहा  है;
बस कोई गारंटी देने को तैयार नहीं है.…
सब यही कहते हैं.... जैसे इसे रखोगे ये वैसा ही चलेगा ।

Friday, August 22, 2014

तुम्हें कोई शक है ?

इस बार मोदी जीतेगा, तुम्हें कोई शक है
मैं तो वही कहता हूँ जो सत्य है ।
केजरीवाल देश बदल के रख देगा, तुम्हें कोई शक है
मैं तो वही कहता हूँ जो सत्य है ।
राहुल गांधी बहुत बड़े बेवकूफ हैं, तुम्हें कोई शक है
मैं तो वही कहता हूँ जो सत्य है ।
मैं धर्म निरपेक्ष बाकि सब सांप्रदायिक हैं, तुम्हें कोई शक है
मैं तो वही कहता हूँ जो सत्य है ।
मैं ईमानदार बाकि सब भ्रष्ट हैं , तुम्हें कोई शक है
मैं तो वही कहता हूँ जो सत्य है ।
मैं विकास पुरुष, स्थिरता का वाहक हूँ , तुम्हें कोई शक है
मैं तो वही कहता हूँ जो सत्य है ।
मैं पूंजीवादी बाकी सब समाजवादी हैं, तुम्हें कोई शक है
मैं तो वही कहता हूँ जो सत्य है ।
मैं नहीं आया तो देश टूट जाएगा, तुम्हें कोई शक है
मैं तो वही कहता हूँ जो सत्य है ।
वो आ गया तो खून की नदियां बहेंगी, तुम्हें कोई शक है
मैं तो वही कहता हूँ जो सत्य है ।

तभी किसी ने बोला.... बहुत बड़े बुद्धिजीवी लगते हो,
मैंने बोला, तुम्हें कोई शक है??
क्यूंकि यही सत्य है...यही सत्य है!

Saturday, March 30, 2013

आवाजें....

जैसे ही अपने कमरे से बाहर निकलता हूँ ,
माध्यम चाहे जो भी हो,
हर तरफ से बस आवाजें ही आवाजें, हर तरह की आवाजें |

किसी के रोने की  तो किसी के हंसने की ,
किसी के चिल्लाने की तो किसी को कोसने की ,
किसी के गुस्से की तो किसी के पछताने की ,
किसी के झुंझलाहट की तो किसी के सांत्वना की 
अनगिनत.....आवाजें ही आवाजें , हर तरह की आवाजें।

सामूहिक रूप में ये एक शोर सी लगती हैं,
ना तो इनके मायने दीखते हैं, ना ही कोई उद्देश्य
मन करता है ,
इनसे दूर... इस शोर से दूर.... बस निश्चिन्तता  और शान्ति |

किन्तु,
ये शान्ति भी चुभती है, ये निश्चिन्तता भी खटकती है ,
क्या वो शोर ही था ?क्या वो आवाजें बेमानी थी ?
कहीं मैं समझने में भूल तो नहीं कर रहा ?
या  मैं समझकर भी अनजाना बनना चाहता हूँ ?
फिर से बाहर निकलता हूँ ...
इस बार थोडा परखने की कोशिश करता हूँ 
कुछ समझता भी हूँ ..कुछ अर्थ भी निकलते हैं
फिर भी अंत में सामूहिक रूप से....सब शोर ही लगता है, सब बेमानी ही लगता है  |
फिर मन करता है....
इनसे दूर... इस शोर से दूर.... बस निश्चिन्तता  और शान्ति |

मन में उलझन बरकरार है, मैं समझ नहीं पा रहा ....
वो शोर है या उन आवाजों के कुछ मायने हैं ?
वो एक समूह के निरर्थक शब्द हैं या इसके घटकों के जीवन के प्रतिबिम्ब ?

Tuesday, April 3, 2012

तुम क्या ही लिखोगे !!!

सोचा कि कुछ लिखूं,
इन बीतें पलों को कुछ शब्दों में बयाँ करूँ,
इन नए अनुभवों को शब्दों का एक रूप दे दूं ,
इन गलियों, इन चौराहों...को कुछ शब्द समर्पित कर दूं | 

तभी कहीं भीतर से एक आवाज़ आती है,
यहाँ तो एक ज़िन्दगी सी बीत गयी, 
और तुम कुछ पलों की बात करते हो |
यहाँ तुम्हारी शख्सियत ही बदल गयी, 
और तुम अनुभवों को शब्दों में बयाँ करने की बात करते हो |

ये गलियाँ, ये चौराहे...
जहाँ एक अलग सी ज़िन्दगी ही पनपती है, 
जहाँ हर रोज नए विचार जन्म लेते हैं,
जहाँ हर रोज एक नवीनता का आभास होता है,
जहाँ ना तो कोई बंधन है  ना ही विचारों के प्रवाह को थामने वाली पुरानी मान्यताएं,
और तुम इन्हें कुछ शब्द समर्पित करने की बात करते हो | 

तुम क्या ही कहोगे, तुम क्या ही लिखोगे 
तुम्हारे हर शब्द, तुम्हारे हर विचार, तुम्हारी हर सोच
इस जीवन का ही एक प्रतिबिम्ब है |
ये जीवन , ये पल , ये अनुभव तुम्हारे व्यक्तित्व के मूल में हैं ,
तुम्हारा यह अस्तित्व...इन्हीं पलों, इन्हीं विचारों की एक  देन है |
तुम तो बस उन पुरातन पदचिन्हों का अनुसरण कर सकते हो,
इस अवसर हेतु ऋणी हो सकते हो , बस ऋणी हो सकते हो | 

Wednesday, January 25, 2012

मिश्राजी की चिट्ठियां - हमारा राष्ट्रीय अवकाश गणतंत्र दिवस


प्यारे पाठकों,
सबसे पहले आप सभी को मिश्राजी का प्रणाम !

आज 26 जनवरी है तो सोचा आपको एक चिट्ठी लिखी जाए | वैसे तो 26 जनवरी  को हिंदी में गणतंत्र दिवस भी कहते हैं किन्तु अगर मैं इन शब्दों का प्रयोग करूँ तो कुछ पाठकों को शायद समझने में कष्ट होगा और फिर वह चिट्ठी ही क्या जो पढने वाले तक अपनी बात ना पहुंचा पाए |  वैसे तो आजकल अपना गणतंत्र केवल शब्दों के खेल में ही फंसा हुआ है फिर भी मैं निवेदन करूँगा की  आप शब्दों को छोढ़कर भावनाओं पर ध्यान केन्द्रित करें | 
वैसे आप भी सोच रहे होंगे इस ईमेल, फेसबुक और SMS के ज़माने में मिश्राजी को चिट्ठी लिखने की क्या सूझी ? हालाँकि इसका कोई स्पष्ट कारण तो मेरे पास नहीं है फिर भी मुझे लगा की अगर बात पुराने तरीके से कही जाए तो हो सकता है लोगों को ज्यादा समझ में आये | वैसे भी आजकल जब टाइम्स ऑफ़ इंडिया की बातें गंभीरता से लेने लायक नहीं हैं तो फेसबुक की क्या मजाल और ईमेल का तो क्या ही कहना...आधे से ज्यादा ईमेल तो हम पढ़ते भी नहीं हैं | खैर चलिए, जब हमने चिट्ठी लिख दी है तो उम्मीद करूँगा आप पढ़ भी लेंगे | वैसे चिट्ठी लिखने का एक कारण यह भी है की पता नहीं हमारे गणतंत्र में फेसबुक की हालत चीन जैसी कब हो जाए और मेरी बात को किसी संप्रदाय, समूह या फिर व्यक्ति विशेष के विरूद्ध साजिश का हिस्सा बता दिया जाए |  
वैसे आज सुबह के समाचार पत्रों में आपने देशभक्ति की कई सारे बातें पढ़ी होंगी...चाहे जो हो जाए, आज के दिन हर समाचार पत्र को देश और इसके कर्णधारों की जरूर याद आती है और मुख्य पृष्ठ पर वास्तविक प्रेम की जगह देशप्रेम दिखाई देता है... परन्तु सच कहूं तो ये सब बेमानी है | आज के दौर में देशप्रेम की जरूरत ही क्या है ? वैसे भी कहते हैं ना... 'हमारे पूर्वज मर गए हमें आज़ादी दिलाने में और हम मरे जा रहे हैं प्रेमिका की बाहों में आज़ादी लुटाने में ' | वैसे भी समय नहीं गंवाना चाहिए..इस प्रेम में एक-एक दिन कीमती होता है तो ऐसे में अगर हमने एक दिन गँवा दिया तो हो सकता है कल हम अपने आपको अपनी प्रेमिका के लिए रोता पाएं | और देश का क्या है.... वो कल भी था, आज भी है और कल भी यहीं रहेगा |  एक बात जो मुझे और ज्यादा कचौटती है कि कुछ लोग अचानक से आज के दिन समाचार पत्र और टीवी चैनलों पर प्रकट हो जाते हैं | देश का लोखा-जोखा प्रस्तुत करने लगते हैं...कुछ देश कि दुर्दशा पर रोने लगते हैं | अब बताइए...भला यह भी कोई बात हुई..साल भर गायब रहते हैं और एक दिन रोने पहुँच जाते हैं | इन्हें मालूम ही नहीं कि देश इतनी तरक्की कर रहा है...हर व्यक्ति को रोजगार, हर भूखे को भोजन, हर बच्चे को शिक्षा के क़ानून लागूं हैं हमारे गणतंत्र में...और भई इतना बड़ा देश है, इतनी विभिन्नताएं...दो-चार सौ साल तो लगेंगे ही इन समस्याओं को दूर होने में | यह भी एक संभावना है कि दो-चार सौ साल तक यह गणतंत्र ना रहे तब भी समस्याएं तो ख़त्म हो जाएँगी ना...जब गणतंत्र ही नहीं हैं तो कैसी समस्याएं | और तो और आज के दिन एका बड़ा ही विचित्र अनुभव होता है...मैं समझ नहीं पाता...कुछ लोगों को अचानक से जोश आ जाएगा और मुझे आमंत्रित कर लेंगे किसी ना किसी चर्चा में | और चर्चा का विषय भी बड़ा अजीब सा होता है...मुझे तो समझ में ही नहीं आता |  अब आप ही बताइए... कैटरिना कैफ और सलमान खान के अफेयर की चर्चा हो तो मजा भी आये...ये बाल विवाह, खाप पंचायत, भ्रष्टाचार, चुनाव सुधार, मानवाधिकार जैसे शब्द किसी को समझ में भी आते हैं | आज एक दिन बड़ी मुश्किल से छुट्टी मिलती है और मुझे जैसे प्रतिभावान युवा का भी समय ऐसे बेकार कि चर्चाओं से बर्बाद कर देते हैं | कुछ लोग तो और भी हैं...अचानक से 'दर्दे-डिस्को' की जगह 'ऐ मेरे वतन के लोगों ' को बजाने लगते हैं...भई मुझे इस कर्ण भेदन से छुटकारा चाहिए | 

मैंने कईयों को अपना कष्ट समझाने की कोशिश की है किन्तु कोई समझने को तैयार ही नहीं हैं | हार मानकर मैंने सोचा चिट्ठी ही लिखी जाए | जब साल भर हम तकिया तानकर सोते हैं तो आज राष्ट्रीय अवकाश के दिन ये सब बातें करके क्यूँ नींद ख़राब की जाए | आज तो हमें और भी मजे से सोना चाहिए...बल्कि मैं तो कहता हूँ अगर काम के भागम भाग में कोई फिल्म छुट गयी हो तो उसे भी निपटा लीजिये | और देखिये ये जो कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी चिल्ला रहे हैं..इनकी बातों में ना पड़ जाइएगा..आपकी छुट्ठी बर्बाद हो जायेगी | अरे देश कहीं भागे नहीं जा रहा है....मजे से चले जा रहा है बल्कि मैं तो कहूँगा रेंग रहा है....अगर हम कहीं पीछे छुट भी गए तो दौड़ के पकड़ लेंगे....अपना ही तो देश है .. | आइये हम और आप मिलकर इस राष्ट्रीय अवकाश का सदुपयोग किया जाए और गणतंत्र दिवस का असली आनंद उठाया जाए |

सभी को राष्ट्रीय अवकाश की ढेरों शुभकामनाएं ! 

आपका,
मिश्राजी !


Friday, August 19, 2011

तू है तो.....

तू है तो इक आशा है,
तू है तो उम्मीद की एक किरण दिखती है
तू है तो विश्वास है कि कल फिर आएगा
तू है तो मेरी भविष्य की उम्मीदें जीती हैं |

तू है तो मुझे इक मंजिल दिखती है,
तू है तो ये कुछ कर गुजरने ज़ज्बा होता है,
तू है तो मेरे ये सपने जन्म लेते हैं,
तू है तो ये सफलता की चाहत पनपती है |

तू है तो ये भावनाएं जन्म लेती हैं
तू है तो मेरी कल्पना उड़ान भरती है ,
तू है तो इन शब्दों की प्रेरणा मिलती है,
तू है तो इन शब्दों से एक कविता निकलती है |

Tuesday, July 26, 2011

ऐ-हुक्म के आकाओं.....

ऐ-हुक्म के आकाओं, मेरी इक बात तुम सुन लो ;
इक आग उठने वाली है, हो सके तो बच लो |

ये सिर-फिरी मनमानियां, चल ना पाएंगी इस क़दर ;
हमारे सब्र को न तोड़ो, तुम अब गिरोगे जमीन पर |

इन आँधियों ने कितनों के, मिटा दिए हैं नामों-निशां,
अभी भी वक़्त है सम्हल लो, न तबाह करो ये गुलिस्तां |

इक नसीहत है तुम्हें, इतिहास के पन्नों को पलट लो ;
इन्कलाब की आवाज़ गूंज रही, इन इशारों को समझ लो |