Tuesday, April 3, 2012

तुम क्या ही लिखोगे !!!

सोचा कि कुछ लिखूं,
इन बीतें पलों को कुछ शब्दों में बयाँ करूँ,
इन नए अनुभवों को शब्दों का एक रूप दे दूं ,
इन गलियों, इन चौराहों...को कुछ शब्द समर्पित कर दूं | 

तभी कहीं भीतर से एक आवाज़ आती है,
यहाँ तो एक ज़िन्दगी सी बीत गयी, 
और तुम कुछ पलों की बात करते हो |
यहाँ तुम्हारी शख्सियत ही बदल गयी, 
और तुम अनुभवों को शब्दों में बयाँ करने की बात करते हो |

ये गलियाँ, ये चौराहे...
जहाँ एक अलग सी ज़िन्दगी ही पनपती है, 
जहाँ हर रोज नए विचार जन्म लेते हैं,
जहाँ हर रोज एक नवीनता का आभास होता है,
जहाँ ना तो कोई बंधन है  ना ही विचारों के प्रवाह को थामने वाली पुरानी मान्यताएं,
और तुम इन्हें कुछ शब्द समर्पित करने की बात करते हो | 

तुम क्या ही कहोगे, तुम क्या ही लिखोगे 
तुम्हारे हर शब्द, तुम्हारे हर विचार, तुम्हारी हर सोच
इस जीवन का ही एक प्रतिबिम्ब है |
ये जीवन , ये पल , ये अनुभव तुम्हारे व्यक्तित्व के मूल में हैं ,
तुम्हारा यह अस्तित्व...इन्हीं पलों, इन्हीं विचारों की एक  देन है |
तुम तो बस उन पुरातन पदचिन्हों का अनुसरण कर सकते हो,
इस अवसर हेतु ऋणी हो सकते हो , बस ऋणी हो सकते हो | 

Wednesday, January 25, 2012

मिश्राजी की चिट्ठियां - हमारा राष्ट्रीय अवकाश गणतंत्र दिवस


प्यारे पाठकों,
सबसे पहले आप सभी को मिश्राजी का प्रणाम !

आज 26 जनवरी है तो सोचा आपको एक चिट्ठी लिखी जाए | वैसे तो 26 जनवरी  को हिंदी में गणतंत्र दिवस भी कहते हैं किन्तु अगर मैं इन शब्दों का प्रयोग करूँ तो कुछ पाठकों को शायद समझने में कष्ट होगा और फिर वह चिट्ठी ही क्या जो पढने वाले तक अपनी बात ना पहुंचा पाए |  वैसे तो आजकल अपना गणतंत्र केवल शब्दों के खेल में ही फंसा हुआ है फिर भी मैं निवेदन करूँगा की  आप शब्दों को छोढ़कर भावनाओं पर ध्यान केन्द्रित करें | 
वैसे आप भी सोच रहे होंगे इस ईमेल, फेसबुक और SMS के ज़माने में मिश्राजी को चिट्ठी लिखने की क्या सूझी ? हालाँकि इसका कोई स्पष्ट कारण तो मेरे पास नहीं है फिर भी मुझे लगा की अगर बात पुराने तरीके से कही जाए तो हो सकता है लोगों को ज्यादा समझ में आये | वैसे भी आजकल जब टाइम्स ऑफ़ इंडिया की बातें गंभीरता से लेने लायक नहीं हैं तो फेसबुक की क्या मजाल और ईमेल का तो क्या ही कहना...आधे से ज्यादा ईमेल तो हम पढ़ते भी नहीं हैं | खैर चलिए, जब हमने चिट्ठी लिख दी है तो उम्मीद करूँगा आप पढ़ भी लेंगे | वैसे चिट्ठी लिखने का एक कारण यह भी है की पता नहीं हमारे गणतंत्र में फेसबुक की हालत चीन जैसी कब हो जाए और मेरी बात को किसी संप्रदाय, समूह या फिर व्यक्ति विशेष के विरूद्ध साजिश का हिस्सा बता दिया जाए |  
वैसे आज सुबह के समाचार पत्रों में आपने देशभक्ति की कई सारे बातें पढ़ी होंगी...चाहे जो हो जाए, आज के दिन हर समाचार पत्र को देश और इसके कर्णधारों की जरूर याद आती है और मुख्य पृष्ठ पर वास्तविक प्रेम की जगह देशप्रेम दिखाई देता है... परन्तु सच कहूं तो ये सब बेमानी है | आज के दौर में देशप्रेम की जरूरत ही क्या है ? वैसे भी कहते हैं ना... 'हमारे पूर्वज मर गए हमें आज़ादी दिलाने में और हम मरे जा रहे हैं प्रेमिका की बाहों में आज़ादी लुटाने में ' | वैसे भी समय नहीं गंवाना चाहिए..इस प्रेम में एक-एक दिन कीमती होता है तो ऐसे में अगर हमने एक दिन गँवा दिया तो हो सकता है कल हम अपने आपको अपनी प्रेमिका के लिए रोता पाएं | और देश का क्या है.... वो कल भी था, आज भी है और कल भी यहीं रहेगा |  एक बात जो मुझे और ज्यादा कचौटती है कि कुछ लोग अचानक से आज के दिन समाचार पत्र और टीवी चैनलों पर प्रकट हो जाते हैं | देश का लोखा-जोखा प्रस्तुत करने लगते हैं...कुछ देश कि दुर्दशा पर रोने लगते हैं | अब बताइए...भला यह भी कोई बात हुई..साल भर गायब रहते हैं और एक दिन रोने पहुँच जाते हैं | इन्हें मालूम ही नहीं कि देश इतनी तरक्की कर रहा है...हर व्यक्ति को रोजगार, हर भूखे को भोजन, हर बच्चे को शिक्षा के क़ानून लागूं हैं हमारे गणतंत्र में...और भई इतना बड़ा देश है, इतनी विभिन्नताएं...दो-चार सौ साल तो लगेंगे ही इन समस्याओं को दूर होने में | यह भी एक संभावना है कि दो-चार सौ साल तक यह गणतंत्र ना रहे तब भी समस्याएं तो ख़त्म हो जाएँगी ना...जब गणतंत्र ही नहीं हैं तो कैसी समस्याएं | और तो और आज के दिन एका बड़ा ही विचित्र अनुभव होता है...मैं समझ नहीं पाता...कुछ लोगों को अचानक से जोश आ जाएगा और मुझे आमंत्रित कर लेंगे किसी ना किसी चर्चा में | और चर्चा का विषय भी बड़ा अजीब सा होता है...मुझे तो समझ में ही नहीं आता |  अब आप ही बताइए... कैटरिना कैफ और सलमान खान के अफेयर की चर्चा हो तो मजा भी आये...ये बाल विवाह, खाप पंचायत, भ्रष्टाचार, चुनाव सुधार, मानवाधिकार जैसे शब्द किसी को समझ में भी आते हैं | आज एक दिन बड़ी मुश्किल से छुट्टी मिलती है और मुझे जैसे प्रतिभावान युवा का भी समय ऐसे बेकार कि चर्चाओं से बर्बाद कर देते हैं | कुछ लोग तो और भी हैं...अचानक से 'दर्दे-डिस्को' की जगह 'ऐ मेरे वतन के लोगों ' को बजाने लगते हैं...भई मुझे इस कर्ण भेदन से छुटकारा चाहिए | 

मैंने कईयों को अपना कष्ट समझाने की कोशिश की है किन्तु कोई समझने को तैयार ही नहीं हैं | हार मानकर मैंने सोचा चिट्ठी ही लिखी जाए | जब साल भर हम तकिया तानकर सोते हैं तो आज राष्ट्रीय अवकाश के दिन ये सब बातें करके क्यूँ नींद ख़राब की जाए | आज तो हमें और भी मजे से सोना चाहिए...बल्कि मैं तो कहता हूँ अगर काम के भागम भाग में कोई फिल्म छुट गयी हो तो उसे भी निपटा लीजिये | और देखिये ये जो कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी चिल्ला रहे हैं..इनकी बातों में ना पड़ जाइएगा..आपकी छुट्ठी बर्बाद हो जायेगी | अरे देश कहीं भागे नहीं जा रहा है....मजे से चले जा रहा है बल्कि मैं तो कहूँगा रेंग रहा है....अगर हम कहीं पीछे छुट भी गए तो दौड़ के पकड़ लेंगे....अपना ही तो देश है .. | आइये हम और आप मिलकर इस राष्ट्रीय अवकाश का सदुपयोग किया जाए और गणतंत्र दिवस का असली आनंद उठाया जाए |

सभी को राष्ट्रीय अवकाश की ढेरों शुभकामनाएं ! 

आपका,
मिश्राजी !


Friday, August 19, 2011

तू है तो.....

तू है तो इक आशा है,
तू है तो उम्मीद की एक किरण दिखती है
तू है तो विश्वास है कि कल फिर आएगा
तू है तो मेरी भविष्य की उम्मीदें जीती हैं |

तू है तो मुझे इक मंजिल दिखती है,
तू है तो ये कुछ कर गुजरने ज़ज्बा होता है,
तू है तो मेरे ये सपने जन्म लेते हैं,
तू है तो ये सफलता की चाहत पनपती है |

तू है तो ये भावनाएं जन्म लेती हैं
तू है तो मेरी कल्पना उड़ान भरती है ,
तू है तो इन शब्दों की प्रेरणा मिलती है,
तू है तो इन शब्दों से एक कविता निकलती है |

Tuesday, July 26, 2011

ऐ-हुक्म के आकाओं.....

ऐ-हुक्म के आकाओं, मेरी इक बात तुम सुन लो ;
इक आग उठने वाली है, हो सके तो बच लो |

ये सिर-फिरी मनमानियां, चल ना पाएंगी इस क़दर ;
हमारे सब्र को न तोड़ो, तुम अब गिरोगे जमीन पर |

इन आँधियों ने कितनों के, मिटा दिए हैं नामों-निशां,
अभी भी वक़्त है सम्हल लो, न तबाह करो ये गुलिस्तां |

इक नसीहत है तुम्हें, इतिहास के पन्नों को पलट लो ;
इन्कलाब की आवाज़ गूंज रही, इन इशारों को समझ लो |


Sunday, July 17, 2011

मैं चाहता हूँ...

हवा की स्वच्छन्द्ता चाहता हूँ,
लहरों की चंचलता चाहता हूँ, 
इस असीम आकाश की गंभीरता चाहता हूँ,
क्षितिज जैसा विस्तार चाहता हूँ |
पेड़ पर लिपटी बेल का उत्साह चाहता हूँ,
सागर की गहराई चाहता हूँ, 
चांदनी की शीतलता चाहता हूँ,
और इस दुनिया में बस इंसानियत की पहचान चाहता हूँ |  

Thursday, May 26, 2011

प्यार में ज़िन्दगी बिताइए....

इधर से जो गुजर गयी, उसी पे हम मचल गए,
जो कुछ न हो सका तो फिर करीब से निकल गए |
कुछ पल का दुःख फिर मस्त हो हम चल लिए,
नए चेहरों की तलाश में फिर हम बढ़ लिए | 

सभी हसीन सभी जवान किसी पे दिल को हारिए,
जब किसी पे दिल आ जाये तो उसके लिए फाईट मारिये |
दिले-ज़ज्बात इज़हार करने में कभी ना हिचकिचाईये,
इन्कार का डर निकाल कर प्रेम पथ पर बढ़ते जाइए |

अगर सफल ना हुए तो तनिक भी ना घबराईये,
दिल को सम्हालिए, और फिर से खोज में लग जाईये |
दुनिया में हसीनों की कमी नहीं, दिल को ये समझाइये,
रोने धोने में में क्या रखा है, प्यार में ज़िन्दगी बिताइए |

यह कविता मेरे और मेरे प्रिय मित्र शैलेष अग्रवाल के सम्मिलित प्रयास का परिणाम है |  

Sunday, May 22, 2011

कुछ पंक्तियाँ...

नींद आती ही है किसको !
जैसे ही मैं अपने कमरे कि तरफ बढ़ा तो किसी ने कहा "शुभरात्रि!!"
अब इसका जवाब मैं क्या ही दूं, यहाँ नींद आती ही है किसको, यहाँ तो सब आराम करते हैं | 
आराम करते हैं ताकि ये शरीर जवाब ना दे जाए, ये अंग काम करते रहे|
चैन से सोये तो ना जाने कितना समय हो गया, अब तो वो सुनहरे अतीत की यादें लगती हैं | 
अब तो सुबह कि ताज़ी किरणे भी इस सतत जीवन प्रवाह में एक मोड़ की तरह लगती हैं,
अब तो सपने में भी ज़िन्दगी दौड़ती रहती है, हम दौड़ते रहते हैं  |




पंक्तियाँ!
आज चिर-परिचित पन्नों में कुछ पंक्तियों को ढूंढने की कोशिश कर रहा था,
पता नहीं वो पंक्तियाँ कहाँ खो सी गयी हैं ?
अक्षर तो जाने पहचाने से लगते हैं, लेकिन वो पंक्तियाँ नहीं मिल रही....
या उन्हें मैं पहचान नहीं पा रहा...
कहीं ऐसा तो नहीं इस बदलते परिदृश्य में...उन पंक्तियों के मायने बदल गए हैं..
या शायद परिस्थितियां बदल गयी हैं ..और उन पुरानी पंक्तियों में मैं नए अर्थ ढूँढने की कोशिश कर रहा हूँ...
कहीं ऐसा तो नहीं इस परिवर्तनशील समाज में, मेरा इन पंक्तियों को ढूंढना ही अब प्रासंगिक ना रहा..

जो भी हो, उन किताबों के पन्ने पलटने का यह क्रम जारी है ...
उन पंक्तियों की, उन मायनों की तलाश जारी है...




क्यूँ डरते हो इन परेशानियों से?
क्यूँ डरते हो इन परेशानियों से,
क्यूँ डरते हो इन रास्तों से ?
क्यूँ डरते हो आने वाली चुनौतियों से?
क्यूँ घबराते हो कल के अनजानेपन से ?

अगर ये परेशानियां नहीं होती, तो क्या यही तुम्हारी मंजिल होती ?
और अगर ये रास्ते ना होते तो, तुम्हें कौन अपनी मंजिल तक पहुंचाता?
ये चुनौतियां ही तो हैं जो तुम्हारे लक्ष्य के महत्व को बताती है,  
और ये कल का अनजानापन ही तो है जिसमे एक आशा है, एक अप्रत्याशित ख़ुशी है |




भूत-भविष्य और वर्तमान....
कोई भूत काल की यादों में जीना चाहता है, तो किसी के लिए भविष्य की आशाएं ही जीने का सहारा हैं|  कई हैं जो वर्तमान कि वास्तविकताओं को ही ज़िन्दगी समझते  हैं | उनके लिए ये भूत-भविष्य की बातें बेमानी हैं |
लेकिन मुझ जैसे भी हैं...जो जीते हैं, भूत की सुनहरी यादों के बीच वर्तमान की वास्तविकताओं का सामना करते हुए, भविष्य की  अनगिनत आशाओं साथ!